ग़ज़ल,,,, तबीयत जिस पे आ जाए वही दिलदार होता है।

तबीयत जिस पे आ जाए वही दिलदार होता है
कहां हर आदमी इस प्यार का हकदार होता है

जो शर्तों पर मुहब्बत की वसीयत लिख रहे हो तुम
गलतफहमी है तेरी ये तो बस व्यापार होता है

तुम्हें कीमत अगर मां-बाप की मालूम हो जाती
समझ जाते कि जो कुछ है उन्हीं का प्यार होता है

बड़ों का कायदा कानून क्यूं बंधन सा लगता है
यही तो जिंदगी की नींव का आधार होता है

जो अपने घर की इज्जत और मर्यादा नहीं समझे
उसी का जिंदगी में जीना भी दुश्वार होता है

मुहब्बत के लिए सब कुछ लगाया दाव पर जिसने
ज़माना उसकी खातिर दो मुहीं तलवार होता है

कहां कीमत भी सच्चाई की कोई दे सका रंजन
दिया जिसने वही इस दुनियां से बेजार होता है

आलोक रंजन इंदौरवी

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