Posts

Showing posts from July, 2021

ग़ज़ल,,,,,,,

Image
तुम मिले जब से मुझे मौसम सुहाना हो गया जिंदगी जीने का इक सुंदर बहाना हो गया  जिस नजर नें तुमको देखा वो दीवानी हो गई और मैं भी जानें क्यूं तेरा दीवाना हो गया अब तो बस उसके खयालों मेंहीखोयारहताहूं आजकल इस दिल में उसका आना जाना हो गया दोस्ती की शर्त हम दोनों निभाये इस तरह दायरे में रहके मर्यादा निभाना हो गया ख्वाब की दुनिया धरातल पर उतरती जा रही एक दूजे के लिए प्यारा ठिकाना हो गया जब मिले हम तुम तो जानें किस जहां में खो गए वक्त ठहरा सा लगा हर गम भुलाना हो गया मेरे दिल पर हाथ रख कर तुम भी धड़कन सुन लिए तेरा मेरा साथ उस दिन आशिकाना हो गया आलोक रंजन इंदौरवी

ग़ज़ल-----दर्द किसको यहां अब बताएंगे हम

Image
दर्द किससे यहां अब बताएंगे हम कौन सुनता है किसको सुनायेगे हम तुम तो तन्हा मुझे छोड़ कर रह लिये इस अंधेरे को कैसे दिखाएंगे हम जिंदगी के कई मोड़ देखे हैं तो हैं सोचकर बस यही भूल जाएंगे हम दिल तुम्हें ढूंढता है मगर क्या करें रास्ता  भी  नहीं  कैसे  पाएंगे हम इश्क का एक दीपक मेरे हाथ में तेरी चाहत में उसको जलाएंगे हम तुम समझने की कोशिश किए भी नहीं किस तरह जिंदगी अब बिताएंगे हम तुम मुझे  आजमाते  रहे  उम्र  भर अब तुम्हें भी ज़रा आजमाएंगे हम आलोक रंजन इंदौरवी

ग़ज़ल,,,, तबीयत जिस पे आ जाए वही दिलदार होता है।

Image
तबीयत जिस पे आ जाए वही दिलदार होता है कहां हर आदमी इस प्यार का हकदार होता है जो शर्तों पर मुहब्बत की वसीयत लिख रहे हो तुम गलतफहमी है तेरी ये तो बस व्यापार होता है तुम्हें कीमत अगर मां-बाप की मालूम हो जाती समझ जाते कि जो कुछ है उन्हीं का प्यार होता है बड़ों का कायदा कानून क्यूं बंधन सा लगता है यही तो जिंदगी की नींव का आधार होता है जो अपने घर की इज्जत और मर्यादा नहीं समझे उसी का जिंदगी में जीना भी दुश्वार होता है मुहब्बत के लिए सब कुछ लगाया दाव पर जिसने ज़माना उसकी खातिर दो मुहीं तलवार होता है कहां कीमत भी सच्चाई की कोई दे सका रंजन दिया जिसने वही इस दुनियां से बेजार होता है आलोक रंजन इंदौरवी

कविता आलोक रंजन इंदौरवी

Image
मन की सीमा के आसपास  मै तुमको ढूंढा करता हूं मन की चंचल किरणों के संग  एक सपना बूनां करता हूं अविभाजित मन की दीवारों  पर तेरी ही तस्वीर लगी आंखों में झांक झांक करके  मस्ती में झूमां करता हूं  रिश्ता भी एक कसौटी है  इसका प्रतिकार नहीं करता अनुचित अपनी अभिव्यक्ति का  दुर्बल व्यवहार नहीं करता तुम जो भी हो जैसे भी हो  सम्मान तुम्हारा दिल में है मैं प्रेम परीक्षा की खातिर  तुमको लाचार नहीं करता  यह पुष्प समर्पण है मेरा  तुम भी इसको स्वीकार करो जब प्रेम हृदय में पलता है  तो इसका कुछ आधार करो पुर्वार्जित  कर्मों का कोई  आसार दिखाई देता है तेरा ऐसे मिलना मुझको इकरार दिखाई देता है इस पावन प्रेम तपस्या का अद्भुत कोई संगम होगा मुझको तो प्रेम जगत का एक  संसार दिखाई देता है  गीतों की स्वर लहरी बनकर  तुम प्रेम सुधा वर्षा जाओ मन मधुबन को देकर सुगंध अपना आंचल लहरा जाओ मैं और प्रतीक्षा कर लूंगा  कर्तव्य निभाने की खातिर तुम राधा बनकर के मुझको  मोहन का राज बता जाओ आलोक रंजन इंदौरवी

मेरा हृदय उद्गार कवि गिरिराज पांडेय

Image
!! मेरा हृदय उद्गार!  नीले नीले अंबर नीचे  श्वेत वर्ण के बादल थे  हिम पर्वत पर्वत के जैसे  दूर दिखाई देते थे  ऐसा लगता जैसे कोई  रुई का फाहा चलता है  आगे बढ़ने को दूजे से  बेताब दिखाई देता है  दौड़ रहे हैं एक दिशा में  देते मधुमय का संदेश  ऐसा लगता छुआ छुऔवल का  इन सब में हो रहा खेल  देख देख कर खेल यहां का  ब्योम शांत सा बैठा था  रोज चमकते चांद पर अब तो  काली घटा का पहरा था  दृश्य यहां का देख रहा हूं  पल-पल उसे निहार रहा हूं  डूब के भावो में ही उनके  कविता का श्रृंगार किया हूं  गिरिराज पांडे  बेरमऊ  प्रतापगढ़

कविता पुष्पा राठौर फरीदाबाद

Image
प्रेम बंध  स्पंदन में ज्यों करूण क्रन्द प्रमुदित करता ज्यों अंतरंग। भ्रमरों का मधुमय स्वर गुंजन करता जैसे साधना भंग।। अधरों से रस का पान किया गठबंधन कर लाई हो संग। विक्षिप्त हृदय कलिका स्नेह ज्यों भीग गया हो अंगअंग।। कानन  पराग से ओत प्रोत मधुकर पलकों में किये बंद। गजगामिन सी मस्त चाल छलकाता बदन जैसे मकरंद।। , रक्तिम कपोल कल्पित काया मुसकाई मन में हो सुगंध। लिपटी सहमी मनचली वेल कर लाई ज्यो अमृत प्रबंध।। अंखियां ज्यों करती मौन मुखर होठो पर हंसता प्रेमबंध। लखि नायक के दो नैनबृन्द मधुशाला की ज्यों मधुर गंध।।                  पुष्प लता राठौर

जब दिल ही मचल जाए तो किस का कुसूर है

Image
जब दिल ही मचल जाये तो किसका कुसूर है ये रूप गजब ढाये तो किसका कुसूर है ये इश्क का जुनूं भी कहां देखता है कुछ जब इसका असर आये तो किसका कुसूर है ऐसे किसी की हिम्मत पड़ती नहीं मगर इस आग में जल जाये तो किसका कुसूर है खुशबू से हो रही है पहचान उसकी अब दिलवर ही महक जाये तो किसका कुसूर है इंशान तो इंशान है आखिर करे तो क्या जब मन ही बहक जाये तो किसका कुसूर है इस दर्द को तो मैंने उनसे छुपाया था आंखों से छलक जाए तो किसका कुसूर है उनके बिना न मुझको अब चैन मिल रहा तन मन ही तड़प जाए तो किस का कुसूर है आलोक रंजन इंदौरवी

ग़ज़ल,, कभी कोई नहीं कमतर यहां पर

Image
कभी कोई नहीं कमतर यहां पर सभी हैं जादुई मंतर यहां पर बड़े तोहफे  मिले हैं खूब उनको नही कोई सुखनवर है यहां पर इजाजत लेके आओ तुम कभी तो दिखा देंगे समंदर है यहां पर समझ लो तुम जरा बारीकियों को उसमें मुझ में तो अंतर है यहां पर वो मीठा बोलता तो है बहुत जिसके हाथों में खंजर है यहां पर वहां पर रोज राशन बाटते हैं सियासत की जो हलचल है यहां पर तेरी तस्वीर अब कैसे मिलेगी  वो मेरे दिल के अंदर है यहां पर आलोक रंजन इंदौरवी

ग़ज़ल। आपके कितने दीवाने हो गए

Image
आपके कितने दिवानें हो गए मेरे  जैसे  कुछ  पुरानें हो गए ढूंढते रहते हैं फिर भी आप कुछ आजकल कितने बहानें हो गए एक छतरी में चले हैं दस कदम आज फिर मौसम सुहानें हो गए बाद मुद्दत हमनें देखी बस्तियां महल जैसे  शामियानें  हो  गए जब बदलने ही लगी तकदीर तो उनके दिल में भी ठिकानें हो गए आलोक रंजन इंदौरवी

ग़ज़ल ,,,मैं भी समय के साथ बदलता चला गया

Image
मैं भी समय के साथ बदलता चला गया हर रास्ते का छोर निकलता चला गया जो फूल बगीचे में लगाया था शौक से खुशबू से उसके घर ये महकता चला गया मेहनत से पढ़के जिसने परीक्षा किया है पास वो जैसे आफताब चमकता चला गया इस मुफलिसी में जिसने संभाला है रास्ता उस शक्स का हर रास्ता खुलता चला गया शुरुआत में तो मैं भी अकेले ही चल दिया कुछ ही कदम पे काफिला मिलता चला गया भूखे को मैंने रोटी खिलाई जो आज हाथ से इतना वो खुश हुआ कि हंसता चला गया बचना सियासतों के रंजन सवाल से इसमें फंसा जो और उलझता चला गया आलोक रंजन इंदौरवी

ग़ज़ल,,, दर्दे दिल की एक कहानी लिखना है

Image
दर्दे दिल की एक कहानी लिखना है आया क्यों आंखों में पानी लिखना है सुनकर उनके दिल का हाल लगा मुझको गहरी है ये प्रीत दिवानी लिखना है इश्क मुहब्बत प्यार इसे ही कहते हैं आई है फिर एक जवानी लिखना है अपने दिल का राज छुपाके तुम रक्खो हमको इसकी एक निशानी लिखना है आंखों के उजले उजले सपनें को अब रंगों से भरकर अंजानी, लिखना है प्रेम दिवानों का किस्सा दुहराकर के मिलने की रुत एक सुहानी लिखना है सागर  की  गहराई  में  उतरें  रंजन पागल दिल की है नादानी लिखना है आलोक रंजन इंदौरवी