कविता आलोक रंजन इंदौरवी

मन की सीमा के आसपास
 मै तुमको ढूंढा करता हूं
मन की चंचल किरणों के संग 
एक सपना बूनां करता हूं

अविभाजित मन की दीवारों
 पर तेरी ही तस्वीर लगी
आंखों में झांक झांक करके 
मस्ती में झूमां करता हूं

 रिश्ता भी एक कसौटी है
 इसका प्रतिकार नहीं करता
अनुचित अपनी अभिव्यक्ति का
 दुर्बल व्यवहार नहीं करता

तुम जो भी हो जैसे भी हो
 सम्मान तुम्हारा दिल में है
मैं प्रेम परीक्षा की खातिर 
तुमको लाचार नहीं करता

 यह पुष्प समर्पण है मेरा
 तुम भी इसको स्वीकार करो
जब प्रेम हृदय में पलता है
 तो इसका कुछ आधार करो

पुर्वार्जित  कर्मों का कोई 
आसार दिखाई देता है
तेरा ऐसे मिलना मुझको
इकरार दिखाई देता है

इस पावन प्रेम तपस्या का
अद्भुत कोई संगम होगा
मुझको तो प्रेम जगत का एक
 संसार दिखाई देता है

 गीतों की स्वर लहरी बनकर 
तुम प्रेम सुधा वर्षा जाओ
मन मधुबन को देकर सुगंध
अपना आंचल लहरा जाओ

मैं और प्रतीक्षा कर लूंगा
 कर्तव्य निभाने की खातिर
तुम राधा बनकर के मुझको
 मोहन का राज बता जाओ

आलोक रंजन इंदौरवी

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