जब दिल ही मचल जाए तो किस का कुसूर है
जब दिल ही मचल जाये तो किसका कुसूर है
ये रूप गजब ढाये तो किसका कुसूर है
ये इश्क का जुनूं भी कहां देखता है कुछ
जब इसका असर आये तो किसका कुसूर है
ऐसे किसी की हिम्मत पड़ती नहीं मगर
इस आग में जल जाये तो किसका कुसूर है
खुशबू से हो रही है पहचान उसकी अब
दिलवर ही महक जाये तो किसका कुसूर है
इंशान तो इंशान है आखिर करे तो क्या
जब मन ही बहक जाये तो किसका कुसूर है
इस दर्द को तो मैंने उनसे छुपाया था
आंखों से छलक जाए तो किसका कुसूर है
उनके बिना न मुझको अब चैन मिल रहा
तन मन ही तड़प जाए तो किस का कुसूर है
आलोक रंजन इंदौरवी
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