कविता पुष्पा राठौर फरीदाबाद
प्रेम बंध
स्पंदन में ज्यों करूण क्रन्द प्रमुदित करता ज्यों अंतरंग।
भ्रमरों का मधुमय स्वर गुंजन करता जैसे साधना भंग।।
अधरों से रस का पान किया गठबंधन कर लाई हो संग।
विक्षिप्त हृदय कलिका स्नेह ज्यों भीग गया हो अंगअंग।।
कानन पराग से ओत प्रोत मधुकर पलकों में किये बंद।
गजगामिन सी मस्त चाल छलकाता बदन जैसे मकरंद।।
रक्तिम कपोल कल्पित काया मुसकाई मन में हो सुगंध।
लिपटी सहमी मनचली वेल कर लाई ज्यो अमृत प्रबंध।।
अंखियां ज्यों करती मौन मुखर होठो पर हंसता प्रेमबंध।
लखि नायक के दो नैनबृन्द मधुशाला की ज्यों मधुर गंध।।
पुष्प लता राठौर
Comments
Post a Comment