ग़ज़ल,, कभी कोई नहीं कमतर यहां पर
कभी कोई नहीं कमतर यहां पर
सभी हैं जादुई मंतर यहां पर
बड़े तोहफे मिले हैं खूब उनको
नही कोई सुखनवर है यहां पर
इजाजत लेके आओ तुम कभी तो
दिखा देंगे समंदर है यहां पर
समझ लो तुम जरा बारीकियों को
उसमें मुझ में तो अंतर है यहां पर
वो मीठा बोलता तो है बहुत
जिसके हाथों में खंजर है यहां पर
वहां पर रोज राशन बाटते हैं
सियासत की जो हलचल है यहां पर
तेरी तस्वीर अब कैसे मिलेगी
वो मेरे दिल के अंदर है यहां पर
आलोक रंजन इंदौरवी
बहुत खूब
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