ग़ज़ल ,,,मैं भी समय के साथ बदलता चला गया

मैं भी समय के साथ बदलता चला गया
हर रास्ते का छोर निकलता चला गया

जो फूल बगीचे में लगाया था शौक से
खुशबू से उसके घर ये महकता चला गया

मेहनत से पढ़के जिसने परीक्षा किया है पास
वो जैसे आफताब चमकता चला गया

इस मुफलिसी में जिसने संभाला है रास्ता
उस शक्स का हर रास्ता खुलता चला गया

शुरुआत में तो मैं भी अकेले ही चल दिया
कुछ ही कदम पे काफिला मिलता चला गया

भूखे को मैंने रोटी खिलाई जो आज हाथ से
इतना वो खुश हुआ कि हंसता चला गया

बचना सियासतों के रंजन सवाल से
इसमें फंसा जो और उलझता चला गया

आलोक रंजन इंदौरवी

Comments

  1. अलग अलग पहलू का अच्छा वर्णन किया है 👌👌भाव प्रधान है👌👌

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