मेरा हृदय उद्गार कवि गिरिराज पांडेय

!! मेरा हृदय उद्गार!

 नीले नीले अंबर नीचे 
श्वेत वर्ण के बादल थे 
हिम पर्वत पर्वत के जैसे
 दूर दिखाई देते थे 
ऐसा लगता जैसे कोई 
रुई का फाहा चलता है
 आगे बढ़ने को दूजे से
 बेताब दिखाई देता है
 दौड़ रहे हैं एक दिशा में 
देते मधुमय का संदेश
 ऐसा लगता छुआ छुऔवल का
 इन सब में हो रहा खेल 
देख देख कर खेल यहां का 
ब्योम शांत सा बैठा था
 रोज चमकते चांद पर अब तो 
काली घटा का पहरा था 
दृश्य यहां का देख रहा हूं 
पल-पल उसे निहार रहा हूं 
डूब के भावो में ही उनके 
कविता का श्रृंगार किया हूं

 गिरिराज पांडे
 बेरमऊ 
प्रतापगढ़

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